यूँ तो दिल्ली शहर कई बार उजड़ा और कई बार बसा ये महज एक शहर नहीं बल्कि कल भी ये हुक्मरानो का ख्वाब था और आज भी एक ख्वाब है। जिसके पास दिल्ली उसका सारा हिन्दोस्तान यही रिवायत आज भी बरक़रार है। बहरहाल मौका ईद अल-अज़हा यानि कुर्बानी की ईद का है। तो दिल्ली में एक ईद ऐसी भी गुजरी जिसमें दिल्ली वालों के कई अपने ही कुर्बान हो गए। दरअसल बात है 1739 की जब करनाल में मुग़ल फौज को शिकस्त देने और बादशाह मुहम्मद शाह को कैदी बना लेने के बाद नादिर शाह आज के रोज ही दिल्ली में दाखिल हुआ था। अगले दिन ईद अल-अज़हा थी उसने दिल्ली की तमाम मस्जिदों में अपने नाम का खुत्बा पढ़वाया और टकसालों में उसके नाम के सिक्के ढाले जाने लगे। अभी चंद ही दिन गुज़रे थे कि शहर में अफवाह फैल गई कि एक तवायफ़ ने नादिर शाह को क़त्ल कर दिया है।
दिल्ली के लोगों ने इससे शह पाकर शहर में तैनात ईरानी सिपाहियों को क़त्ल करना शुरू कर दिया। इसके बाद जो हुआ वो तारीख के पन्नों पर कुछ यूं बयां हैं – “22 मार्च 1739 का दिन था, सूरज की किरणें अभी अभी मशरिक़ी आसमान से फूटी ही थीं कि नादिर शाह दुर्रानी अपने घोड़े पर सवार लाल क़िले से निकल आया। उसका बदन ज़र्रा-बक़्तर से ढका हुआ था और सर पर लोहे का कवच और कमर पर तलवार बंधी हुई थी उसके कमांडर और जरनैल भी उनके साथ थे। उसका रुख आधा मील दूर चांदनी चौक में मौजूद रोशनउद्दौला मस्जिद की ओर था। मस्जिद के बुलंद सहन में खड़े हो कर उसने तलवार म्यान से निकाल ली।”
ये उसके सिपाहियों के लिए इशारा था। सुबह के नौ बजे क़त्ल-ए-आम शुरू हुआ। ईरानी सिपाहियों ने घर-घर जाकर जो मिला उसे मारना शुरू कर दिया। इस दौरान इतना खून बहा कि नालियां सुर्ख हो गयीं। लाहौरी दरवाज़ा, फ़ैज़ बाज़ार, काबुली दरवाज़ा, अजमेरी दरवाज़ा, हौज़ क़ाज़ी और जौहरी बाज़ार के घने इलाक़े लाशों से पट गए। हजारों औरतों का बलात्कार किया गया, सैकड़ों ने कुओं में कूद कूद कर के अपनी जान दे दी। कई लोगों ने ख़ुद अपनी बेटियों और बीवीयों को क़त्ल कर दिया ताकि वो ईरानी सिपाहियों के हत्थे न चढ़ जाएं।
आनंद राम मुख्लिस अपनी किताब तज़किरा में ज़िक्र करते हैं – कुछ जगह मुखालफत की कोशिश की गयी थी। लेकिन ज्यादातर जगह पर लोगों को बिलावजह कत्ल कर दिया गया था। पारसियों ने तशद्दुद की सारी हदें पार कर दी थीं। एक तवील अरसे तक गलियां लाशों से ऐसी पटी पड़ीं थीं जैसे किसी बाग़ में बेजान पत्तियों और फूलों सी। शहर राख में तब्दील हो गया था।
मुग़ल बादशाह मुहम्मद शाह को रहम की भीख मांगने के लिए मजबूर किया गया था इन भयानक घटनाओं को समकालीन इतिहास में दर्ज किया गया है- जैसे रुस्तम अली की तारिख-ए-हिंदी, अब्दुल करीम के बयान-ए-वाक़ई और आनंद राम मुखलिस की तज़किरा में।
अकसर तारीख के हवालों के से ऐसा कहा जाता है की उस दिन तीस हज़ार दिल्ली वालों को मौत के घाट उतार दिया गया था। आख़िर मोहम्मद शाह ने अपने वजीरे आजम को रोशन-उद्दौला मस्जिद में नादिर शाह के पास भेजा। कहा जाता है कि वजीरे आजम नंगे पांव और नंगे सिर नादिर शाह के सामने पेश हुए और फ़ारसी में ये शेर पढ़ा- “और कोई नहीं बचा जिसे तू अपनी तलवार से क़त्ल करे…सिवाए इसके कि मुर्दा को ज़िंदा करे और दोबारा क़त्ल करे” इस पर कहीं जाकर नादिर शाह ने तलवार दोबारा म्यान में डाली।
